Threads of time...

Thursday, July 31, 2008

उनकी इंनायत

ये इनायत है उनकी
जो हमे फलक पे बैठा दिया
उनकी आँखों में देखा जब
तो अपना होश ही गवा दिया
ऑंखें हैं या समुन्दर की गहराई
उठती है जब ज्यौं ली चाँद ने अंगराइ
बहती नदी की निर्मलता है उन् में
और है जिंदगी की गहराई
बचपन की चपलता भी है
और है भविष्य की आशाएं
गुलाबों की पंखुरियों की मानिंद
जब खुलती हैं वोह अप्सरा
तो हो जाए हर तरफ़ उज्जला

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posted by Nomade at 9:03 PM

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