Threads of time...

Sunday, January 6, 2008

उसकी खामोशी

मेरी खामोशी को उल्फत न समझ बैठना अये दोस्त
यह वह कहर है जो तुमने ढाया और हमने निभाया है
डूबते को तिनके का सहारा हो सकता हो शायद
हमने तो सितारों तले भी घनघोर अँधेरा पाया है
दो पल हम भी मुस्कुरा लेते तेरी महफिल में आकर
पर यह मंजर मेरे रकीब को रास नहीं आया है
उसकी खुदाई में कोई तो रिश्ता होता जो बांध सकता हम दोनो को
पर न जाने क्या सोच कर उसने यह जहाँ बनाया है
सितम करने वाले हज़ारों हैं चारों तरफ घेरे हुए
महरम लगाने वाला दूर जाता हुआ सिर्फ एक वही साया है.
आस्थाओं और विश्वास कि भूल भुलेइया में खो गया हूँ में
आज अन्धकार में विलीन होता वह मेरा ही पर्छाया है
इतनी शिदद्तों से उमर भर संजोया-संभाला किये जिसको
आज टूट के बिखरता मेरा अस्तित्व धूमिल होने को आया है.
हमने तो सितारों तले भी घनघोर अँधेरा पाया है !

Labels:

posted by Nomade at 6:14 PM

0 Comments:

Post a Comment

<< Home