Threads of time...

Wednesday, February 13, 2008

वह बीते हुएय पल

बीते हुएय कल के टुकढ़े टुकढ़े हुएय पल
उन् बेतरतीब पलों में बसी कुछ यादें
कुछ जाने पहचाने चेहरे और कुछ धुमिल अक्स
जिंदगी की किताब से झाँकते वह अपने और पराये
रेगिस्तान की रेत में जैसे कोई लुक्का छुप्पी खेल रहा हो
चंद आवाजें हैं जो अब बोझिल और धीमी हो चली हैं
कुछ मंजर हैं आते जाते धरातल से आकाश को मिलते
यहीं कहीं दबा हुआ है मेरे अरमानों का मज्जार
वह साए भी अब चल दिए जो उस पर फूल चड़ाते
चहु और सिर्फ़ चीखता सन्नाटा है जो हर शोर को दबाता है
दिल कुछ कहने को मचलता है और दर्द उस रक्त में बह निकलता है
शरीर जैसे लम्बी यात्रा के बाद थक के निढाल हो चला है
जुबान भी जैसे कुछ कहने की व्यर्थता से परिचित हो रही है
पर आंखें है न जाने किस और मंज्जर की तलाश में खुली हैं
अभी भी इन् पाशान कारणों को कुछ पर्वच्नों की आस है
कोई नहीं हैं यहाँ सिर्फ़ घेराता अँधेरा ही मेरे पास है
सब चोर चले दमन अब सिर्फ़ अन्धकार का ही प्रकाश है !

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posted by Nomade at 2:58 AM 0 comments