Threads of time...

Saturday, January 26, 2008

कुछ रिश्ते

हमारी जिंदगी के रिश्ते
कुछ इस कदर जुदा निकले
समझते रहे जिनको अपना
वोही लखत-ए-जिगर बेवफ़ा निकले
निभाना था उमर भर साथ जिन्होंने
वोही सुखनवर जनाजे का सिला निकले
खूब सींचा जिन क्यारियों को हमने
जब बहार आई तो उनके माली ही जुदा निकले
जिनको कहते रहे काफिर उमर भर सब लोग
वोही अनजान शख्स हमारे खुदा निकले !

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posted by Nomade at 10:14 AM 1 comments